शुक्रवार, 11 फ़रवरी 2011

ग़ज़ल - किशन नादान

क्यों जलाते हो घर किसी और का
इतनी तबाही तनिक तकलीफ ना हुई तेरे सीने में
कभी खुद का घर जलाकर तो देख
कितनी तकलीफ होती है बेघर सी ज़िदगी जीने में।।

एक ही जगह बैठे हम दोनों
मैं भजन गाउॅं तू पढ़ ले नमाज़
मैं भी इंसॉं तू भी इंसॉ इंसानीयत ही अपनी मज़हब
गले मिल जा आओ मिलकर बनाएॅं एक एसा समाज।।

लेखक- किशन नादान

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